रतनजोत


 संजीव साँखला 


 कृषि क्षेत्र में वैज्ञानिकों द्वारा नित नये प्रयोग किये जाते रहे है। कृषि विज्ञान पर आधारित कुछ ऐसे संगठन संस्थान भी है जो प्रदेश अथवा राष्ट्र स्तर पर कृषि क्षेत्र में नवीन अनुसंधान एवं प्रयोग करते रहते है। आधुनिक कृषि में किसानों के लिए ये प्रयोग विभिन्न दृष्टिकोण से उपयोगी भी सिद्ध हुए है। रतनजोत पर किये गये सफल प्रयोगों के आधार पर यह एक बहूपयोगी पौध सिद्ध हुआ है इसके बीज से डीजल एवं ओषधियाँ बनाई जा सकती है। इसके बीज में 40 प्रतिशत तक तेल की मात्रा पाई जाती है।  इसकी विशेषता यह है कि यह हल्की तथा बंजर भूमि  में भी उगाया जा सकता है। इसके पौधे को अधिक सिंचाई की भी आवश्यकता नही रहती है। इसे चंद्रजोत के नाम से जाना जाता है। औषधिय गुणों से सम्पन्न इस पौधे से डीजल के अलावा साबुन लुब्रीकेण्टए मोमबत्ती आदि का कच्चा माल भी तैयार किया जा सकता है। इसके पौधे को जानवर भी नही खाते है। इसे बाड़ बनाने तथा सजावट के रूप में भी काम में लिया जा सकता है। इसका पौधा शुष्क वातावरण तथा अतिवृष्टि को भी सहन करने की क्षमता रखता है। इसका मूल उद्गम स्थान दक्षिण अमरीका है तथा इसका वानस्पतिक नाम जेट्रोफा कर्कस प्रतिकूल प्राकृतिक परिस्थितियों में भी इसका पौधा अपना अस्तित्व बनाये रखने में सक्षम है।
 रतनजोत को सभी प्रकार की भूमि ;भिन्न.भिन्न तरह की मिट्टी  पर आसानी से उगाया जा सकता है। गर्म और नमी वाला मौसम इसके लिए अधिक अनुकूल रहता है। बहुत कम नमी की स्थिति में भी यह जिंदा रह सकता है। इस पौधे की एक अन्य विशेषता यह भी है कि इसे ऐसी भुमि पर भी उगाया जा सकता है जिस पर अन्य पौधे नही उगते। रतनजोत की बुआई के लिए सर्वाधिक उपयुक्त समय मानसून के आगमन जुलाई अगस्त माह तक रहता है। एक बार बोने के 15.20 दिन बाद पानी देना अच्छा रहता है। फल लगते समय सिंचाई करने से फसल से वृद्धि की संभावनाएँ ज्यादा रहती है। उपलब्ध भूमि के अनुसार एक पौधे से दूसरे पौधे की दूरी 1 से 3 मीटर तक रखी जा सकती है। इसके पौधे को गड्ढे या पोलीथीन की थैली में भी उगाया  जा सकता है। प्रारंभ से इसके पौधे निकट होने पर उखाड़ कर पर्याप्त दूरी पर रोपे जा सकते है। रोपाई के लिए कतार से कतार तथा पौधे से पौधे की दूरी 2 मीटर रखना उचित रहता है। बीज को बोने से पूर्व एक रात्रि तक भिगोकर रखना तथा उपचारित किया जाना चाहिए। एक हैक्टेयर भूमि में 2500 पौधे तक बोये जा सकते है। इनके लिए सभी तरह के उर्वरक उपयुक्त पाये गये है।

अश्वगन्धा

वानस्पतिक नामरू बीथानिया सोमनीफेरा
 अश्वगन्धा आयुर्वेदिक औषधियों में प्रयुक्त होने वाली महत्वपूर्ण औषधिय नकदी फसल है। इसके पत्ते बैंगन के पत्तों के समान होते हैए ऊंचाई लगभग 3.4 फीट तक होती है। इसकी शाखाएं टेड़ी.मेढ़ी एवं रोमों से युक्त होती है इसके पुष्प एक साथ गुच्छो में आते है। फल पत्र दण्ड के पास 1से4 इंच बड़े होते हैए जिनका आकार मटर के समान होता है और पकने पर हल्के पीले या लाल हो जाते है। अश्वगन्धा के बीज मोटे एवं चपटे आकार के होते है। इसकी जड़ें औषधीय उपयोग में आती है जो एक से डेढ फुट लम्बी एक से डेढ इंच मोटी मूली की तरह  मजबूत चिकनी बाहर से हल्के भूरे रंग की तथा अन्दर से सफेद होती है। जड़ों का स्वाद कड़वा एवं तीक्ष्ण होता है। इसकी जड़ों में तीव्र गंध आने के कारण ही इसे अश्वगंधा कहते है।
 अश्वगंधा की खेती मध्यप्रदेश में मन्दसौर जिले में मनासाए नीमच भानपुर तथा जावेद तहसील और मन्दसौर के सीमावर्ती भाग तथा राजस्थान के नागौर कोटा व झालावाड़ जिलों में की जाती है। सूखी जड़े आयुर्वेदिक तथा यूनानी औषधियां बनाने के काम आती है। इसके जड़ों की गठिया रोग चर्म रोग फेफड़ों की सूजन पेट की फोड़ों तथा मंदाग्नि के उपचार के काम में लिया जाता है। इसकी जड़ों के सेवन से शरीर में प्रतिरोधी क्षमता बनती है। इसकी हरी पत्तियां जोड़ों की सूजनए क्षय रोग एवं दुःखती आंखों के इलाज के काम आती है। इसकी जड़ों में एल्कालाइड्स एवं पत्तियों में स्टराइडस होते है।
जलवायु. अश्वगन्धा एक देरी से बोई जाने वाली खरीफ फसल है। अच्छी फसल के लिए मौसम शुष्क तथा जमींन में प्रचुर मात्रा में नमी होनी चाहिए। रबी पूर्व या शरद् ऋतु में वर्षा होने पर जड़ों में वृद्धि तथा पैदावार में गुणात्मक सुधार होता है।
भूमि का चुनाव एवं तैयारी अश्वगन्धा की फसल से अधिक ऊपज के लिए अच्छे जल निकास वाली हल्की दोमट भूमि उपयुक्त है। मानसून प्रारम्भ होने के पहले दो बार आड़ी खड़ी जुताई कर पाटा लगा देवें। बुवाई से पूर्व एक बार बक्खर चलाकर मिट्टी को भुरभुरी कर लेनी चाहिए।
उन्नत किस्में अश्वगन्धा की खेती के लिए मुख्यतया स्थानीय बीज काम में लिया जाता है। वर्तमान में इसकी दो किस्में जवाहर अश्वगन्धा 20ए तथा डब्ल्यू एस.90.130 मन्दसौर कृषि कालेज द्वारा विकसित की गई है। दोनों किस्में सभी तरह के वातावरण में उपयुक्त पाई गई है। इनकी जड़ों की उत्पादन क्षमता करीब 5.6 क्विंटल है जबकि देशी किस्म से 3.4 क्ंवटल जड़ें प्राप्त होती है।
बीज की मात्रारू. कतारों में बोने पर 6.8 किलों तथा छिटकवां बोने पर 8.10 किलों बीज प्रति हैक्टयर की आवश्यकता होती है।
बिजोपचार. बुवाई के पूर्व बीज को थायरम या डांयथेन एम.45 या मैन्कोजेबे नामक दवा से 3.4 ग्राम प्रति किलों बीज की दर से उपचारित करना चाहिए।
बुवाई का समय. इसकी बुवाई जुलाई से सितम्बर माह तक की जा सकती है। अश्वगन्धा की अधिक उपज लेने के लिए बुवाई ऐसे समय पर करनी चाहिए जब वर्षा तीन चैथाई हो जाय तथा जमीन पानी सोखकर तृप्त हो जाय अतः अगस्त के तीसरे सप्ताह से सितम्बर के प्रथम सप्ताह तक बुवाई करें।
बुवाई की विधि अश्वगन्धा की बुवाई बीज द्वारा तथा नर्सरी में पौधे तैयार करके की जाती है। बीज द्वारा बुवाई कतारों व छिड़काव तरीके से की जाती है। बीज द्वारा बुवाई के लिए कतार से कतार की दूरी 30 सेन्टीमीटर रखनी चाहिए एवं बीज 3 सेन्टीमीटर गहराई पर बोने चाहिए। छिड़काव द्वारा बुवाई करने के लिए बीज से बराबर मात्रा में बालू रेत या गोबर की खाद मिला लेनी चाहिए क्योकि इसके बीज छोटे आकार के होते है। बालू रेत या गोबर की खाद में मिले हुए बीजों को समान रूप् से तैयार खेत में छिड़काव करके हल्का पाटा चला चला देना चाहिए तथा हल्की सिंचाई देनी चाहिए। अश्वगन्धा की बुवाई पौध रोपण करके भी की जा सकती है। इसके लिए जुलाई के मध्य में बीजों से नर्सरी तैयार की जाती है और सितम्बर के प्रथम सप्ताह में तैयार पौधों को 10 सेन्टीमीटर की दूरी पर रोपा जाना चाहिए।
खाद एवं उर्वरक. भूमि में जीवांश की मात्रा बनाये रखने के लिए 10.15 टन सड़ी गोबर के खाद प्रति हैक्टेयर डाले। 30 किलों नत्रजनए 30 किलो फास्फोरस एवं 20 किलों पोटाश प्रति हैक्टेयर की दर से बुवाई के समय डाले।
निराई.गुड़ाई. फसल बुवाई के 30.35 दिन बाद एक बार निराई.गुड़ाई करनी चाहिए तथा प्रभावी तरीके से खरपतवार नियन्त्रण के लिए 75 किलोग्राम आईसीप्रोट्रयूराम बुवाई के समय प्रति हैक्टेयर के हिसाब से छिड़काव करना चाहिए।
सिंचाई. आमतौर पर सिंचाई की आवश्यकता नही होती है लेकिन वर्षा की कमी के समय सिंचाई की जा सकती है।
पौध संरक्षण. अश्वगन्धा की फसल पर कीट व्याधि का कोई विशेष असर नही होता है। कभी.कभी इस फसल में महू मोयला कीट तथा पौष तुलसा या अंगमारी एवं जड़ एवं पदगलन लग जाता है। महू कीट के नियंत्रण के लिए मिथाइल डिमटान 25 मिली लीटर पानी में घोलकर छिड़काव करना चाहिए।
झुलसा या अंगमारी इस रोग का प्रकोप बुवाई के 60से.90 दिनों बाद होता है। इस रोग के कारण पौधों की निचली पत्तियों में हल्के पीले रंग के गोलए अनियमित आकार के धब्बे बनते हैए खाद में ये धब्बे भूरे रंग के हो जाते है और धीरे.धीरे डालियों के अलावा सभी भागों पर इसका प्रकोप हो जाता और पत्ते मुरझाकर गिर जाते है। नमी के मौसम में इसका संक्रमण अधिक होता है। इस रोग के नियंत्रण के लिए स्वस्थ एवं प्रमाणित बीज का उपयोग करें तथा मैन्कोजेब 3 ग्राम प्रति लीटर पानी में घोलकर छिड़काव करें।


वर्मी कम्पोस्ट

 


                                         आज जहाँ किसान को खेती की लागत  कम करने की चिंता है वही उपभोक्ता रसायनों के अत्यधिक उपयोग से पैदा होने वाली खेती की गुणवता से आशंकित व परेशान है। ऐसी स्थिति में किसानों के सामने एक मात्र विकल्प बचता है प्राकृतिक तौर.तरीकों का अधिकाधिक प्रयोग। अधिकाधिक कृषि उपज प्राप्त करने तथा अपनी कृषि योग्य भूमि को भविष्य के लिए भी सुरक्षित रखने का एक सरल.सस्ता व परम्परागत तरीका है वर्मी कम्पोस्ट। यहां किसान भाइयों को वर्मी कम्पोस्ट के बारे में अधिकाधिक जानकारी उपलब्ध करवाई जा रही है।
वर्मी कम्पोस्ट क्या है . प्राकृतिक रूप से केचुओं को जंदा रखने के लिए कचरा एवं मिट्टी की जरूरत होती है। मिट्टी व कचरा खाने के पश्चात केचुंए जो अपशिष्ट पदार्थ निकालते है उसे ही वर्मी कम्पोस्ट के नाम से पुकारा जाता है। यह पदार्थ कई प्रकार के पोषक तत्वों से भरपूर रहता तथा खेती में जैविक खाद के रूप में काम आता है। इसके उपयोग से एक और कृषि उपज में भारी वृद्धि होती है वहीं दूसरी ओर मिट्टी की गुणवता में वृद्धि होकर भविष्य के लिए भी सुरक्षित मानी जाती है।
वर्मी कम्पोस्ट के लिए केंचुएरू. सामान्यता पाये जाने वाले केंचुए जमीन के नीचे रहते है व मिट्टी खाते है। अतः इनका प्रयोग खाद बनाने के लिए नही किया जा सकता। एक विशेष प्रजाति ष्इमीजेइक केंचुए जो धरातल पर रहते है एवं कार्बनिक पदार्थ खाते है इनको पाला जा सकता है। इनकी उपर्युक्त विशेषताओं के कारण इस प्रजाति ;एंसीनिया कटिडाद्ध के केंचुए का उपयोग वर्मी कम्पोस्ट खाद बनाने के लिए किया जा सकता है। इस प्रजाति के केंचुओं की निम्न विशेषताएं है.
. एसिनियां फटिडा एक जुझारू प्रवृति का केंचुआ है जो कि 10से35 डिग्री सेण्टीग्रेड तापमान एवं 20 से 60 प्रतिशत आर्द्रता की स्थिति में आसानी से रह सकता है।
. जिंदा केचुआ का वनज 1000 से 1500 मिलीग्राम तक होता है इनका जीवन 150से180 दिन का होता है।
 केंचुए जन्म के 40.से45 दिनों बाद संसर्ग के पश्चात प्रत्येक 2से3 दिन के बीच एक अण्डा देते है और यह प्रक्रिया 4से6 सप्ताह तक चलती रहती है।
. एक केंचुए के अण्डे से 3 से 5 तक छोटे बच्चे निकलते है।
केचुआ अंधेरें में रहना पंसद करता हैए अंधेरे में ही प्रजनन करता है और रोशनी होते ही तुरंत अंधेरे की तलाश में कचरे के ढेर में चला जाता है।
. एक केंचुए के शरीर से निकलने वाली कास्टिंग में कई प्रकार के जीवाणु होते है जिनमें से कुछ एन्जाइम क्रियाओं द्वारा जिबरलिनए साइटों किनिंस और आक्सीन नामक प्लाण्ट हार्मोंन का उत्पादन करते है।
. केंचुए का कास्टिंग पतले डोर के समान होती है एवं इसमें पर्याप्त नमी पाई होती है। केंचुए के शरीर से निकला म्यूकस पदार्थ हानिकारक पेयोजंस को नष्ट करने में समर्थ होता है।
वर्मी कम्पोस्ट के लिए कच्चा माल. सभी प्रकार के पशुओं का मल गोबर वर्मी कम्पोस्ट बनाने के काम आता है। औसतन 10 दिन से लेकर 2 महिने तक का गोबर वर्मी कम्पोस्ट बनाने के लिए उत्तम रहता है। गोबर में मिट्टी नही होनी चाहिए। करीब.करीब सभी फसलों के अवशेषों को केंचुओं को खिलाया जा सकता है। गीले कचरे को 2से3 दिन ढेरी में रखने के बाद बैड में डाल सकते है।
 वर्मी कम्पोस्ट बनाने की विधि.स्थान.जगह धरातल से थोड़ी ऊपर उठी हुई होनी चाहिए जहां सूर्य का प्रकाश सीधा नही आता है। गहरे पेड़ों की छांव छप्पर टिन शेड आदि इसके  उपयुक्त स्थान है। कच्चे माल ;गोबर को पहले 5.से7 दिन तक पानी डालकर ठण्डा कर बैड के लिए तैयार करें बैड बनाने के बाद उसको ठण्डा एवं मुलायम बनाने रखने के लिए लगातार पानी छिडकत रहे है। बैड में हाथ डालने पर मुलायम होने का एहसास होना चाहिए और गोबर गर्म नही लगाया। बैड मे नमी ऊँगलियों की पोर में पानी दिखता हुआ रहे लेकिन टपके नही। केचुओं के लिए यह सबसे सही नमी दिखाता है। अधिक नमी होने पर पानी की मात्रा कम करें और सूखा होने पर पानी की मात्रा बढा देवे।
 केंचुए छोड़ने के लिए एक दिन बाद बैड को कुट्टीए कटे हुए अथवा बारीक कचरे से करीब अंगुली मोटाई से ढक देवे। ढकते समय ध्यान रहे कि बैड में अब सतह पर पूर्णतया अंधेरा हो गया है।
 यहां पर स्मरणीय यह है कि केंचुओं द्वारा खाने का काम बैड के नीचे किया जाता है एवं कास्टिंग बैड के ऊपरी धरातल पर गिराई जाती है। अब चूकि कंचुआ अंधेरे में ही रहता है और रोशनी में बाहर नही आता अतः कचरे से अंधेरा करने पर लगातार खाता रहेगा और ऊपर आकर कास्टिंग गिराएगा। बैड खुली रखने पर केंचए खाने एवं कास्टिंग बनाने का काम सिर्फ रात में ही करेंगे उससे खाद बहुत ही धीरे बनेगी। बैड को ढकने के टाट की बोरी भी काम ली जा सकती है। बैड के ढके होने पर पानी की जरूरत भी कम होती है और उसमें तापमान भी ठीक रहता है। ढकी हुई बैड में केंचुओं के लिए अण्डे देने में भी सुविधा रहती है। अधिक अण्डे देने पर उनकी संख्या में बढोतरी भी अधिक होगी।
 बैड की लम्बाई और केंचुओं की संख्या के आधार पर खाद के बनने में समय लगता है। अतः तब तक बैड की रोज थोड़ी देखभाल कर लेना जरुरी होता है। इसके लिए हर रोज अलग.अलग जगह पर बैड के ऊपर टाट हटाकर देंखे। धरातल पर बहुत बारीक  मींगनी;चाय की पत्ति जैसी  दिखाई दे तो समझ लेना चाहिए कि केंचुए ने खाना शुरू कर दिया है। बैड में हाथ डालने पर मुलायम एहसास होना चाहिए। थोड़ा भी कड़ापन लगने पर पंजे की कुरेरी लगानी होगी। इसके लिए टाट को एक तरफ उताकर कुरेरी लगांए फिर उसी टाट से पुनः ढक दे। जब केंचुओं की बैड में 4.से6 अंगुली जितनी गहराही तक वर्मी कम्पोस्ट बन जाए तब इसकी ऊपरी परत बैड के किसी एक साइट में उतार लेनी चाहिए। खाद उतारने के लिए पहले टाट को दूसरी तरफ उतार दे। आप देखेंगे कि केंचुए तुरंत अंदर चले गये है। अब पंजे से जितनी गहराई तक खाद बनी है वहां तक कुरेरी लगा दे। धीरे.धीरे केंचुए अंदर चले जाएंगे। तब बनी हुई खाद हाथ से एक तरफ उतार लेवे। दो.तीन परतों में करीब 6 अंगुली जितनी खाद उतारी जा सकती है। खाद उतारने के बाद बैड में फिर से पंजा लगाकर ढकना होगा।
विशेष बात जब खाद एक तरफ उतारी जाती है तो उसके साथ बहुत सारे अण्डे और केंचुओं के छोटे बच्चे भी आ सकते है अतः इस खाद को बैड के साइड में हटाकर ही रखे। उससे जब अण्डों से बच्चे निकलेंगे तो वो वापस बैड में जा सकेंगे। यदि इस खाद को दूर रख दिया जाय या काम में ले लिया जाय तो अण्डे नष्ट हो जाएंगे तथा केंचुओं की वृद्धि रूक जायेगी।
दूसरा बैड तैयार करना एक बार पूरी खाद उतारने के बाद सबसे नीचे केंचुए ही रह जाते हैं उनको एक तरफ करके दुबारा बैड बनाई जा सकती है। बनी हुई खाद को एक समान नमी पर ठीक ढंग से सुरक्षित रखना चाहिए। 10.से12 दिनों में बनी हुई खाद में से केंचुओं की छटाई कर खाद में काम में लिया जा सकती है या अच्छी तरह से पेंक करके रखी जा सकती है। छंटे हुए केंचुओं तथा अण्डों से नई बैड तैयार की जा सकती है। इस प्रकार यह काम लगातार जारी रखा जा सकता है। धीरे.धीरे केंचुओं की संख्या बढती जाएगी और बनाने में लगने वाला समय भी कम होता जायेगो। ;इस विधि में 8 फीट लम्बाई की बैड हो तो उसमें 250 से 300 किलों वर्मी कम्पोस्ट   40 से 50 दिन में तैयार किया जा सकता है।
वर्मी कम्पोस्ट के भौतिक गुण. वर्मी कम्पोस्ट दानेदार गहरे भूरे काले रंग का मुलायम  पदार्थ है। यह  खरपतवार एवं हानिकारक जीवाणों से रहित है।

 


   

 

 

 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 
 
 

               

 

     
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