भारत के धार्मिक नवोत्थान के पुरोधाओं राजा राममोहन राय (1772-1833), महात्माज्योतिराव फुले(1827-1890),स्वामी दयानन्द सरस्वती (1824-1883),महादेव गोविन्द रानाडे (1942-1901),में से सामाजिक क्रांति के जनक के रुप में केवल महात्मा ज्योतिबा फुले की गणना की जा सकती है। महात्मा फुले से प्रत्यक्ष या परोक्ष रुप से प्रभावित होकर विनायक दामोदर सावरकर (1833-1966) तथा डाँ. भीमराव अम्बेडकर (1891-1956) ने सामाजिक क्रांति के स्वर और आंदोलन को आगे बढ़ाया।

                   डाँ. अम्बेडकर तो महात्मा फुले के व्यक्तित्व-कृतित्व से अत्यधिक प्रभावित थे। वे महात्मा फुले को अपने सामाजिक सामाजिक आंदोलन की प्ररेणा का स्त्रोत मनाते थे। 28 अक्टूबर 1954 को पुरूदर स्टेडियम, मुम्बई में भाशण देते हुए उन्होंने महात्मा बुद्ध तथा कबीर के बाद महात्मा फुले को अपना तीसरा गुरू माना है। डाँ. अम्बेडकर ने अपने भाषण में कहा (अर्थात् मेरे तृतीय गुरू ज्योतिबा फुले हैं। केवल उन्होंने ही मानवता का पाठ पढाया।  प्रारम्भिक राजनीतिक आन्दोलन में हमने ज्योतिबा के पथ का अनुसरण किया, मेरा जीवन उनसे प्रभावित  हुआ है।) 

    डाँ. अम्बेडकर ने अपनी पुस्तक ‘शूद्र कौन थे’ को 10 अक्टूबर 1946 को महात्मा फुले को समर्पित करते हुए लिखा-‘‘जिन्होंने हिन्दु समाज की छोटी जातियों को, उच्च वर्णो के प्रति उनकी गुलामी की भावना के सम्बंध में जागृत किया और जिन्होने विदेशी शासन से मुक्ती पाने से भी सामाजिक लोकतंत्र की स्थापना अधिक महत्पुर्ण है, इस सिद्धान्त का प्रतिपादन किया, उस आधुनिक भारत के महान षूद्र महात्मा फुले की स्मृति में सादर समर्पित।’’

गोविंदराम-चिमणाबाई फुले दम्पति के परिवार में पुणे में 11 अप्रेल 1827 को 

ज्योति राव फुले का जन्म हुआ। उन्होंने मराठी शिक्षा(1831-1838) तथा बाद में स्काटिष मिशन स्कूल में अंग्रेजी शिक्षा (1841-1847) प्राप्त की। 1840 में विवाह विवाह 9 वर्षीय सावित्री बाई (1831-1897) से  हुआ। युवक फुले के व्यक्ति निर्माण में रियासत के उदारवाद, अमेरिका लेखक टामस पेन के ग्रंथ ‘राइट्स आफ मैन’ तथा ‘दी एज आँफ रीजन’को पढा उन्होंने अस्पृश्य जाति के लहू की मांग से तलवार-भाला आदि चलाने का शारीरिक प्रशिक्षण प्राप्त किया। छत्रपति शिवाजी, वाशिंगटन और मार्टिन् लूथर के जीवन चरित्र के अध्ययन से युवक ज्योति स्वतन्त्रता समानता और उदारवादी चिंतन के प्रबल पक्षधर बने।


समाजिक क्रातिकारी और उनका सामाजिक चिंतन शून्य में उदय नहीं होता है।  उसके एंतिहासिक और एक रूढिवादी ब्राह्मण ने युवक ज्याति राव का घोर अपमान करते हुए कहा-‘‘अरे शूद्र! ब्राह्मणों के साथ चलते की तेरी हिम्मत कैसे हुई? तूने तो जातीय व्यवस्था की सारी मर्यादाएं ही तोंड़ दीं। ‘‘अपमानित युवक ज्योति राव ने यह अनुभव किया कि राजनीतिक दासता की तुलना में सामाजिक दासता  अधिक अमानवीय और अपमानजनक होती है। इस प्रकार सामाजिक लोकतंत्र की स्थापना उनके जीवन संघर्ष का प्राथमिक तथा अंतिम लक्ष्य बन गया। 


शिक्षा को सामाजिक परिवर्तन का माध्यम मानते हुए फुले दम्पत्ति ने 1848 में सर्वप्रथम पुणे में बुधवार पेठ में  अपनी प्रथम कन्या पाठशाला प्रारम्भ की। कन्या शिक्षा विरोधी भू-देवों के कारण फुले दम्पत्ति को 1849 में अपना पितृ-गृह छोड़ना पड़ा। मुम्बई सरकार के अभिलेखों में ज्योतिबा फुले द्वारा पुणे  तथा उसके पास के क्षेत्रों में   शूद्रादि बालक-बालिकाओं के लिए कुल 18 विद्यालय खोले जाने का उल्लेख मिलता है। 1855 में उन्होंने पुणे में भारत की प्रथम रात्रि प्रौढ़शाला और 1852 में मराठी पुस्तकों के प्रथम पुस्तकालय की स्थापना अपमानित समाजिक क्रांति से अभिप्राय हिन्दुत्व की परम्परागत सामाजिक धार्मिक रूढिवादी कुरीतियों के विरूद्व आंदोलन करने से है। सामाजिक क्रांति का प्रथम तथा अन्तिम लक्ष्य सामाजिक धार्मिक पुनर्जागरण आंदोलन और सांस्कृतिक नवोत्थान की प्रक्रिया को गति एवं दिशा प्रदान करता है।

 

                     भारत के धार्मिक नवोत्थान के पुरोधाओं राजा राममोहन राय (1772-1833), महात्माज्योतिराव फुले(1827-1890),स्वामी दयानन्द सरस्वती (1824-1883),महादेव गोविन्द रानाडे (1942-1901),में से सामाजिक क्रांति के जनक के रुप में केवल महात्मा ज्योतिबा फुले की गणना की जा सकती है। महात्मा फुले से प्रत्यक्ष या परोक्ष रुप से प्रभावित होकर विनायक दामोदर सावरकर (1833-1966) तथा डाॅ. भीमराव अम्बेडकर (1891-1956) ने सामाजिक क्रांति के स्वर और आंदोलन को आगे बढ़ाया।
                   डाॅ. अम्बेडकर तो महात्मा फुले के व्यक्तित्व-कृतित्व से अत्यधिक प्रभावित थे। वे महात्मा फुले को अपने सामाजिक सामाजिक आंदोलन की प्ररेणा का स्त्रोत मनाते थे। 28 अक्टूबर 1954 को पुरूदर स्टेडियम, मुम्बई में भाशण देते हुए उन्होंने महात्मा बुद्ध तथा कबीर के बाद महात्मा फुले को अपना तीसरा गुरू माना है। डाँं. अम्बेडकर ने अपने भाशण में कहा (अर्थात् मेरे तृतीय गुरू ज्योतिबा फुले हैं। केवल उन्होंने ही मानवता का पाठ पढाया।  प्रारम्भिक राजनीतिक आन्दोलन में हमने ज्योतिबा के पथ का अनुसरण किया, मेरा जीवन उनसे प्रभावित  हुआ है।) 
    डाँ. अम्बेडकर ने अपनी पुस्तक ‘षूद्र कौन थे?’ को 10 अक्टूबर 1946 को महात्मा फुले को समर्पित करते हुए लिखा-‘‘जिन्होंने हिन्दु समाज की छोटी जातियों को, उच्च वर्णो के प्रति उनकी गुलामी की भावना के सम्बंध में जागृत किया और जिन्होने विदेषी षासन से मुक्ती पाने से भी सामाजिक लोकतंत्र की स्थापना अधिक महत्पुर्ण है, इस सिद्धान्त का प्रतिपादन किया, उस आधुनिक भारत के महान षूद्र महात्मा फुले की स्र्मति में सादर समर्पित।’’
गोविंदराम-चिमणाबाई फुले दम्पति के परिवार में पुणे में 11 अप्रेल 1827 को 
ज्योति राव फुले का जन्म हुआ। उन्होंने मराठी षिक्षा (1831-1838) तथा बाद में स्काटिष मिषन स्कूल में अंग्रेजी षिक्षा (1841-1847) प्राप्त की। 1840 में विवाह विवाह 9 वर्शीय सावित्री बाई (1831-1897) से  हुआ। युवक फुले के व्यक्ति निर्माण में ईसायत के उदारवाद, अमेरिका लेखक टामस पेन के ग्रंथ ‘राइट्स आफ मैन’ तथा ‘दी एज आँफ रीजन’का पडा़। उन्होंने अस्पृश्य जाति के लहू की मांग से तलवार-भाला आदि चलाने का षारीरिक प्रषिक्षण प्राप्त किया। छत्रपति षिवालीश, वाषिंगटन और मार्टिन् लूटर के जीवन चरित्र के अध्ययन से युवक ज्योति स्वतन्त्रता समानता और उदारवादी चिंतन के प्रबज पक्षधर बने।

समाजिक क्रातिकारी और उनका सामाजिक चिंतन षून्य में उदय नहीं होता है।  उसके एंतिहासिक और एक रूढिवादी ब्राहा्रण ने युवक ज्याति राव का घोर अपमान करते हुए कहा-‘‘अरे षुद्र! ब्रहा्रणों के साथ चलते की तेरी हिम्मत कैसे हुई? तूने तो जातीय व्यवस्था की सारी मर्यादाएं ही तोंड़ दीं। ‘‘अपमानित युवक ज्योति राव ने यह अनुभव किया कि राजनीतिक दासता तुलने में सामाजिक दासता की अधिक अतानवीय और अपमानजनक होती है। इस प्रकार सामाजिक लोकतंत्र की स्थापना उनके जीवन संघर्ष का प्राथमिक तथा अंतिम लक्ष्य बन गया। 

शिक्षा को सामाजिक परिवर्तन का माध्यम मानते हुए फुले दम्पत्ति ने 1848 में सर्वप्रथम पुणे में बुधवार पेठ में बुधवार पेठ में अपनी प्रथम कन्याषाला प्रारम्भ की। कन्या षिक्षा विरोधी भू-देवों के कारण फुले दम्पत्ति को 1849 में अपना पितृ-गृह छोड़ना पड़ा। मुम्बई सरकार के अभिलेखों में ज्योतिबा फुले द्वारा पुणे  तथा उसके पास के क्षेत्रों में   षुद्रादि बालक-बालिकाओं के लिए कुल 18 विद्यालय खोले जाने का उल्लेख मिलता है। 1855 में उन्होंने पुणे में भारत की प्रथम रात्रि प्रौढ़शाला और 1852 में मराठी पुस्तकों के प्रथम पुस्तकालय की स्थापना 
टपमानित समाजिक क्रांति से अभिप्राय हन्दूहिन्दुत्व कि परम्परागत सामाजिक धार्मिक रूढिवादी कुरीतियों के विरूद्व आंदोलन करने से है। सामाजिक क्रांति का प्रथम तथा अन्तिम लक्ष्य सामाजिक धार्मिक पुनर्जागरण आंदोलन और सांस्कृतिक नवोत्थान की प्रक्रिया को गति एवं दिशा प्रदान करता है।
 

 

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