भव्य मंदिर का भूमि पूजन एवं शिलान्यास

- :- कार्यक्रम -:


-:- 30 नवम्बर 2011, बुधवार प्रातः 11.00 बजे यज्ञ (हवन) व शिलापूजन -:


-:- 30 नवम्बर 2011, बुधवार रात्रि 8.00 बजे भजन संध्या 
प्रसिद्ध गायक प्रकाश माली द्वारा -:


-:- भूमि पूजन एवं शिलान्यास समारोह 01 दिसम्बर 2011, गुरूवार, प्रातः 11.00 बजे -:

-:- पूजनीय संतों का सान्निध्य -:



पूजनीय आचार्यजी श्री पुरूषोत्तमदासजी महाराज, 
पूजनीय महामण्डलेश्वर श्री राधावन्ददासजी महाराज, 
पूजनीय रामस्नेही श्री रामप्रसादजी महाराज, 
पूजनीय सन्त श्री श्री 108 श्री नृसिंहदासजी महाराज, 
पूजनीय सन्त श्री चेतनगिरीजी महाराज, 
पूजनीय सन्त श्री रामरतनजी महाराज रामस्नेही, 
पूजनीय सन्त श्री रामजीवनजी महाराज रामस्नेही, 
पूजनीय सन्त श्री सन्तोषनाथजी महाराज,
पूजनीय सन्त श्री शुकदेवजी (तुलसीरामजी) महाराज, 

 जन्म - संत लिखमिदास जी का जन्म विक्रम संवत् 1807 आषाढ सुदी 15 (पूर्णिमा) 8 जुलाई 1750  को समुदास जी सोलंकी के घर श्रीमति नत्थी देवी के कोख में हुआ।


आपका जन्म स्थान:-


जन्म स्थान:- राजस्थान के नागौर जिले में चैनार गांव में बड़की बस्ती है और धाम नागौर से 6 किलोमीटर दूर अमरपुरा नामक गांव मे है। जो राष्ट्रीय राजमार्ग 65 पर स्थित है।
बाल्यकाल और भक्ति:- आप बाल्यकाल में ही ईश्वर की अराधना में लीन रहने लगे थे और रामदेव जी भक्ति करते थे। आपके गुरू खिंयारामजी राजपूत थे।



विवाह:- 



आपका विवाह परसारामजी टाक की पुत्री श्रीमति चैनी के साथ हुआ। आपके दो पुत्र और एक पुत्री थी बड़े पुत्र का नाम जगरामजी तथा छोटे पुत्र का नाम गेनदासजी तथा पुत्री का नाम बदिगेना था।
धाम:- लिखमिदासजी महाराज की प्रधान धाम अमरपुरा गुरूद्वारा है, अन्य धामें लेह, गुडला, ताऊसर, गोंआ आदि स्थान पर है आपके मंदिर शिवगंज, अहमदाबाद, मेड़माड़वास, सालावास, सिन्ध आदि स्थानों पर है।





पर्चे और भजन:- 



लिखमीदासजी जी महाराज ने सैकड़ों पर्चें दिये है और हजारों भजन तथा दोहों की रचना की है। आपके कुछ पर्चें निम्न प्रकार है। घोड़े से पैदल हाथ नही आना, अमरपुरा, को खाली करना, महाराज भीमसिंह जी को चारभुजा के दर्शन देना, हाकम द्वारा क्षमा मागकर आपको छोड़ना, बाड़ी में सिचाई करना, जैसलमेर में लड़के को जीवित करना, भगवान द्वारा खेत की कड़ब काटना, एक समय में दो गांवो में जागरण देना, जीवित समाधि की पूर्व में सूचना देना समाधि वाली वस्तुए अहमदाबाद के मूल्ला का

समाधि:- 

लिखमीदासजी महाराज ने विक्रम संवत् 1887 आसोज बदी 6 (षष्टमी) 08 सितम्बर 1830 को ग्राम अमरपुरा जीवित समाधि ली। वर्तमान में आपकी धाम के महंत जीतुराम जी महाराज है। आपकी जयंती पूरे भारत वर्ष में मनाई जाती है।

भारत की प्रथम महिला शिक्षिका

     आधुनिक भारती सामाजिक क्रांति में महात्मा जयोतिराव फूले का उल्लेखनीय योगदान रहा है, उसमें उनकी धर्मपत्नी सावित्री बाई का भी महत्वपूर्ण योगदान रहा है। सावित्री बाई का जन्म ३ जनवरी, १८३१ को महाराद्गट्र के सतारा जिले के नामगांव में हुआ। उनके पिता खंडाजी नेवसे पाटील थे। तत्कालीन परम्परा के अनुसार उनका विवाह ९ वर्ष की बाल्य अवस्था में ज्योतिराव फूले से हो गया था।

शिक्षण  प्रशिक्षण

     विवाह के बाद उनके पति ने उन्हे शिक्षा किया। स्वयं फूले को उसके पिता ने एक मिशनरी स्कूल में भर्ती करवाकर उन्हे अंगेजी शिक्षा दिलवाई और फूले ने घर पर अपनी पत्नी को पढाया-लिखाया। सावित्री बाई के साथ ज्योतिराव के पिता के दूर रिश्ते की एक बहन सगुणाबाई क्षीरसागर भी पढने-लिखने लगी। दोनो ने मराठी भाषा का अच्छा ज्ञान प्राप्त कर लिया। उन्होने अंगेजी मिशनरी महिला स्कूल में शिक्षा प्राप्त कर अध्यापन प्रशिक्षण भी प्राप्त किया।

भारत की प्रथम  शिक्षिका

     १ जनवरी, १८४८ को पुणे में जब फूले ने एक बालिका विद्यालय की स्थापना की, तब वह इस विद्यालय की नही वरन्‌ भारत की प्रथम शिक्षिका बनी। बाद में वह प्रधानाध्यापिका भी बन गई। पुणे की इस स्कुल के संचालन के लिए फूले दम्पति को अथक प्रयास करने पड़े। इस स्कूल में अधिकांश छात्राएं ब्राह्मण जाति की थी लेकिन ब्राह्ममणों ने ही इस महिला स्कूल को चलाने का घोर विरोध किया और इसे धर्मविरोधी बताया। लेकिन सावित्री बाई अपने शिक्षण कार्य में निरन्तर लगी रही।

अछूतों के लिए विद्यालय

     सन्‌ १८४८ में ही पुणे नगर में फूले ने अछूत बस्ती में लड़के-लड कियों के लिए एक स्कूल खोली। यह स्कूल अछूतों का प्रथम विद्यालय था। कुछ ही समय में फूले दम्पति ने पूणे तथा आसपास के गाँवों में १८ स्कूल खोले। इस शुभ कार्य में एक मुस्लिम महिला फातिमा शेख ने भी उनको काफी सहयोग दिया। फातिमा शेख भारत में पहली मुस्लिम अध्यापिका थी।

लेखिका एवं कवयित्री


     सावित्री बाई एक प्रतिभाशाली लेखिका व कवयित्री भी थी। उनका एक कविता संग्रह काव्य फूले सन्‌ १८५४ में प्रकाच्चित हुआ था। उन्होने एक कविता शूद्रों का दुःख लिखी थी। एक अन्य कविता अज्ञान में उन्होने मानव का सबसे बडा शत्रु अज्ञान को ही बतलाया है।

बालहत्या प्रतिबन्धक गृह का संचालन


     सन्‌ १८६३ में जब फूले ने बालहत्या प्रतिबन्धक गृह की स्थापना की तब सावित्री बाई ने ही उसका संचालन किया। उस गृह में लगभग १०० विधवाओं ने अवैध बच्चों का जन्म दिया। उनकी देखभाल सावित्री बाई ने ही की थी। इन्ही बच्चों में से एक ब्राह्मण विधवा के बच्चे को फूले दम्पति ने गोद लिया और उसका नाम यशवंत रखकर उसे अपना उतराधिकारी बनाया।

सत्यच्चोधक समाज के द्वारा निराश्रित बालकों की सेवा


     सन्‌ १८७६-७७ में जब महाराष्ट्र में भयंकर अकाल पडा तो फूले की ओर से स्थापित सत्यच्चोधक समाज द्वारा २०० निराश्रित बच्चों का भरण-पोषण किया गया। इसमें सावित्री बाई ने अपने पति के साथ रहकर बडी सेवा की । तब सावित्री बाई ने पुणे जिले के जुन्नर ग्रामीण क्षेत्र से अपने पति को लिखा था, आप जो कल्याणकारी कार्य कर रहे है, उसमें मैं सदा आपकी सहायता कर सकूं, यही मेरी इच्छा है। इस प्रकार सावित्री बाई ने अपने पति के साथ रहकर अनेक प्रकार के कष्ट सहन किये।
     सन्‌ १८९० में ज्योतिराव के स्वर्गवास के बाद उनके द्वारा स्थापित सत्यशोधक समाज का उन्होने बडी कुशलता से संचालन किया। उन्होने सत्यशोधक समाज की सभा एवं सम्मेलनों में भाग लिया और कार्यकर्ताओं का मार्गदर्शन भी किया। सन्‌ १८९७ में महाराष्ट्र में हैजा फैला, तब हजारों लोग बीमार होकर मरने लगे।

निर्वाण

     सावित्री बाई ने सत्यशोधक समाज के कार्यकर्ताओं के साथ बीमारों की काफी सहायता की। १० मार्च, १८९७ को हैजे से बीमार एक महार एक महार अछूत लड़के की सेवा करते-करते वह स्वयं बीमार होकर स्वर्ग सिधार गई। सावित्री बाई की समाज के प्रति की गई सेवा अनुकरणीय और प्रेरणादायी है।

  •     सावित्री बाई की स्मृति में भारत सरकार द्वारा दिनांक १० मार्च,१९९८ को २.०० रूपये का डाक टिकिट जारी किया  गया। इस आयाताकार टिकिट में सावित्री बाई का चित्र प्रकाच्चित किया गया था। उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा राज्य की सर्वश्रेष्ठ शिक्षिका को प्रति सावित्री बाई फूले पुरस्कार से सम्मानित किया जाता है।
  •   महात्मा ज्योतिराव फूले की स्मृति को चिरस्थायी बनाने के   लिए भारत सरकार ने २८ नवम्बर, १९७७ को २५पैसे का   डाक टिकिट जारी किया था। ३.९२ गुणा २.९० सेन्टीमीटर   आकार के इस टिकिट की ३० लाख प्रतियाँ मुद्रित करवाई  गई थी।.

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

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